किताबों से लेकर कवर तक: प्राइवेट स्कूलों का ‘रिटेल सिंडिकेट’ और अभिभावकों की बेबसी
आज के समय में शिक्षा एक बुनियादी अधिकार के बजाय एक बेहद महंगा व्यवसाय बन चुका है। विशेष रूप से प्राइवेट स्कूलों की मनमानी ने मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि ‘शिक्षा के मंदिर’ अब केवल लाभ कमाने वाली मशीनें बनकर रह गए हैं।

शिक्षा के नाम पर खुली लूट: मनमानी फीस, री-एडमिशन और किताबों का खेल
प्राइवेट स्कूलों की कार्यप्रणाली अब किसी कॉर्पोरेट फर्म से कम नहीं है। स्कूल प्रशासन ने अपनी एक अलग ही अर्थव्यवस्था बना रखी है:
- किताबों और स्टेशनरी का सिंडिकेट: स्कूल खुद ही किताबें, कॉपियाँ, जूते, और ड्रेस बेचते हैं। यहाँ तक कि कॉपी पर चढ़ाने वाले कवर और नाम के स्टिकर तक स्कूल के अंदर से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
- मुनाफाखोरी की हद: बाहर बाजार में जो वस्तु 100 रुपये में मिलती है, स्कूल में उसकी कीमत 300 से 400 रुपये तक वसूल की जाती है।
- परिवारवाद का वर्चस्व: स्कूल के प्रिंसिपल और प्रबंधन का पूरा परिवार ही इस ‘सेल्स डिपार्टमेंट’ को चलाता है। स्कूल के मालिकों के बेटे या करीबी रिश्तेदार इन सामानों की सप्लाई चेन संभालते हैं, जिससे सारा मुनाफा सीधे उनकी जेब में जाता है।
- री-एडमिशन का जाल: हर साल नाममात्र के बदलाव के साथ ‘री-एडमिशन’ के नाम पर मोटी रकम वसूलना स्कूलों का सबसे बड़ा कमाई का जरिया है।
यह मुद्दा न केवल अनैतिक है, बल्कि शिक्षा जगत के लिए एक बड़ा कानूनी और प्रशासनिक संकट है। आपके द्वारा उठाए गए इन विशिष्ट बिंदुओं पर यहाँ विस्तार से जानकारी दी गई है, जिसे आप अपने लेख में शामिल कर सकते हैं:
“किताबों का मायाजाल: खुद छपवाओ, खुद MRP लिखो और हर साल कोर्स बदलो!”
प्राइवेट स्कूलों ने अब किताबों के मामले में एक ऐसा ‘सिंडिकेट’ बना लिया है जो पूरी तरह से एकाधिकार (Monopoly) पर आधारित है। आइए समझते हैं कि यह खेल कैसे काम करता है और क्या कानून इसे इजाजत देता है।
1. खुद की छपाई और अपनी मर्जी की MRP
स्कूल अब सीधे पब्लिशर्स के साथ मिलकर काम करते हैं। वे ऐसी किताबें तैयार करवाते हैं जो बाजार में कहीं उपलब्ध ही नहीं होतीं। चूंकि ये किताबें ‘कस्टमाइज्ड’ (स्कूल के नाम वाली) होती हैं, इसलिए उन पर छपी MRP (Maximum Retail Price) भी उनकी अपनी मनमर्जी की होती है।
- सीधा लूट का गणित: अगर एक सामान्य पब्लिकेशन की किताब बाजार में ₹100 की है, तो स्कूल द्वारा छपवाई गई वही किताब, उसी क्वालिटी के साथ ₹300-400 में बेची जाती है। चूँकि किताब बाजार में कहीं और नहीं मिलती, इसलिए अभिभावक ‘प्राइस तुलना’ (Price Comparison) नहीं कर सकते।
2. हर साल किताब बदलने का ‘सिस्टम’
शिक्षा का मानक हर साल नहीं बदलता, लेकिन स्कूलों का पाठ्यक्रम बदल जाता है। हर साल किताबों के ‘एडिशन’ या ‘पब्लिशर’ बदलना एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति है। इसका एकमात्र उद्देश्य पुरानी किताबों को रद्दी घोषित करना है ताकि अगले सत्र में अभिभावकों को दोबारा नया सेट खरीदने के लिए मजबूर किया जा सके। यह सीधे तौर पर अभिभावकों की जेब पर डाका है।
3. क्या कानून और संविधान इसे इजाजत देते हैं?
इसका स्पष्ट उत्तर है— नहीं!
- NCERT की गाइडलाइंस: भारत सरकार और CBSE के नियमों के अनुसार, स्कूलों को NCERT की किताबें लागू करनी चाहिए। यदि वे प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें रखते हैं, तो उन्हें यह स्पष्ट करना होता है कि वे किसी विशेष दुकान या पब्लिशर से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act): किसी ग्राहक को एक ही स्रोत से सामान खरीदने के लिए मजबूर करना ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) के अंतर्गत आता है।
- शिक्षा का अधिकार (RTE) और राज्य के नियम: लगभग हर राज्य में ‘फीस रेगुलेशन एक्ट’ या शिक्षा विभाग के ऐसे स्पष्ट निर्देश हैं जो स्कूलों को दुकान चलाने (किताबें/ड्रेस बेचना) से रोकते हैं। स्कूल ‘लाभ कमाने वाली संस्था’ (Non-profit) के रूप में पंजीकृत होते हैं, वे ‘रिटेल स्टोर’ नहीं हो सकते।
4. क्यों सरकार मौन है?
संविधान का अनुच्छेद 21-A शिक्षा को अधिकार बनाता है, लेकिन इसे ‘व्यापार’ बनने से रोकने में राज्य की मशीनरी विफल रही है। इसके पीछे मुख्य वजहें हैं:
- निजी स्कूलों का राजनीतिक रसूख: शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा अब उन लोगों के हाथों में है जो खुद विधायक, सांसद या प्रभावशाली राजनीतिक दलों से जुड़े हैं।
- अधिकारियों की ‘सुस्ती’ (Complacency): जब जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) या DC के पास शिकायत जाती है, तो उसे ‘निजी मामला’ बताकर टाल दिया जाता है, जबकि यह एक ‘सार्वजनिक शोषण’ का मुद्दा है।
- कानूनी पेचीदगियाँ: स्कूल अदालत में जाकर स्टे (Stay) ले लेते हैं, जिससे साल भर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती।
सरकारी तंत्र की चुप्पी और ‘डीसी’ की विफलता
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस लूट पर सरकार क्यों चुप है? जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) से लेकर जिला उपायुक्त (DC) तक, हर किसी के दरवाजे पर अभिभावक फरियाद लेकर जाते हैं, लेकिन परिणाम शून्य होता है। फाइलों पर कागजी कार्रवाई होती है, लेकिन स्कूलों की मनमानी पर कोई ठोस असर नहीं पड़ता।
इस चुप्पी के पीछे के संभावित कारण:
- साठ-गांठ: स्कूल संचालकों की पहुंच सत्ता के गलियारों तक होती है। कई बार ये स्कूल राजनीतिक हस्तियों के संरक्षण में चल रहे होते हैं या उनके खुद के होते हैं।
- तंत्र की उदासीनता: शिक्षा विभाग के अधिकारी अक्सर स्कूलों के साथ ‘मिलीभगत’ के आरोप में घिरे रहते हैं।
- कमजोर नियम: मौजूदा कानून इतने लचीले हैं कि स्कूल प्रबंधन आसानी से उनसे बच निकलता है।
क्या भारत को नेपाल से सीखने की जरूरत है?
हाल ही में नेपाल सरकार ने एक साहसिक कदम उठाते हुए प्राइवेट स्कूलों पर नकेल कसी है और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित किया है। यह कदम वहां के शिक्षित युवाओं और जनता के दबाव के कारण संभव हुआ है। कई विकसित देश पहले से ही शिक्षा प्रणाली को ‘लाभ-मुक्त’ (Non-profit) बनाकर इसे सरकार की मुख्य जिम्मेदारी मानते हैं।
क्या भारत में भी अब समय आ गया है कि शिक्षा को पूरी तरह से व्यापार से मुक्त किया जाए? यदि सरकारें सरकारी स्कूलों की बुनियादी ढांचे को प्राइवेट के स्तर का बना दें, तो इन मनमाने स्कूलों की दुकानों पर ताला खुद-ब-खुद लग जाएगा।
निष्कर्ष
शिक्षा बच्चों का भविष्य है, न कि स्कूल मालिकों के बेटे-बेटियों की विलासिता का साधन। जब तक सरकार अभिभावकों की शिकायतों पर केवल आश्वासन देती रहेगी, तब तक यह लूट जारी रहेगी। वक्त आ गया है कि शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा हो, ताकि देश का हर बच्चा बिना किसी आर्थिक शोषण के पढ़ सके। स्कूलों का यह काम कि वे खुद किताबें छपवाएं, खुद ही उनकी कीमत तय करें और हर साल सिलेबस बदल दें, किसी भी शैक्षिक नीति का हिस्सा नहीं है। यह केवल एक ‘ऑर्गेनाइज्ड रैकेट’ है। जब तक अभिभावक संगठित होकर इन स्कूलों का बहिष्कार नहीं करेंगे और न्यायालय में ‘जनहित याचिका’ (PIL) दायर नहीं करेंगे, तब तक यह लूट का चक्र चलता रहेगा।
अभिभावकों को ‘स्कूल प्रबंधन समिति’ (SMC) में अपनी भागीदारी मांगनी चाहिए और सरकारी शिक्षा विभाग में लिखित शिकायत दर्ज करते समय उसकी पावती (Receipt) जरूर लेनी चाहिए, ताकि भविष्य में इसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।
