"झारखंड उत्पाद सिपाही परीक्षा के दौरान रेलवे स्टेशन पर भीड़ और सोते हुए छात्र।""झारखंड उत्पाद सिपाही परीक्षा के दौरान रेलवे स्टेशन पर भीड़ और सोते हुए छात्र।"

रोजगार का ‘आंकड़ा’ और हताशा का ‘सैलाब’

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आज संपन्न हुई उत्पाद सिपाही (Excise Constable) परीक्षा ने न केवल प्रशासनिक तैयारियों की पोल खोली है, बल्कि राज्य की उस कड़वी सच्चाई को भी उजागर किया है जिसे हम लंबे समय से नजरअंदाज कर रहे हैं—बेरोजगारी का ज्वलंत संकट।


इस परीक्षा की विसंगति का सबसे बड़ा प्रमाण इसके पद और आवेदकों की संख्या का अनुपात है। मात्र 583 पदों के लिए लाखों युवाओं का मैदान में उतरना किसी सामान्य भर्ती प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह दर्शाता है कि:

  • रोजगार के अवसरों का गहरा सूखा: राज्य में सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों का सूखा इतना लंबा है कि एक छोटे से पद के लिए भी लाखों शिक्षित युवा अपनी योग्यता को दांव पर लगाकर कतार में खड़े हैं।
  • बेरोजगारी की चरम सीमा: जब लाखों की संख्या में युवा एक पद के लिए दौड़ते हैं, तो यह स्पष्ट है कि निजी क्षेत्र या अन्य क्षेत्रों में सम्मानजनक आजीविका के अवसर नगण्य हैं। यह युवाओं की उस हताशा को दर्शाता है जहाँ वे किसी भी कीमत पर, किसी भी पद पर सरकारी तंत्र का हिस्सा बनने को मजबूर हैं।
  • भविष्य की अनिश्चितता: इतनी बड़ी संख्या में आवेदन यह साबित करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था और रोजगार सृजन के बीच एक बहुत बड़ी खाई है। युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं, लेकिन उनकी दक्षता का उपयोग करने के लिए कोई ठोस नीतियां या इंडस्ट्री बेस नहीं है।

परीक्षा का परिप्रेक्ष्य: फायदे और नुकसान

पहलूविवरण
फायदेराज्य को आवश्यक बल मिलेगा और सफल होने वाले 583 परिवारों को आर्थिक स्थिरता प्राप्त होगी।
नुकसानलाखों युवाओं में पनपती असफलता की कुंठा, परीक्षा प्रक्रिया में अव्यवस्था, और संसाधनों का अत्यधिक दबाव।

जमीनी हकीकत: एक भयावह चित्र

आज की परीक्षा के दौरान जो दृश्य देखने को मिले, वे किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंताजनक हैं:

  • आवास का घोर अभाव: रेल स्टेशनों पर छात्रों का सोना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने दूर-दराज से आने वाले परीक्षार्थियों के लिए रैन बसेरों या ठहरने के उचित इंतजाम नहीं किए थे।
  • अभिभावकों की उपेक्षा: परीक्षा केंद्रों के बाहर इंतजार कर रहे हजारों अभिभावकों के लिए बैठने तक की व्यवस्था नहीं थी। धूप और धूल में बुजुर्गों का खड़ा रहना प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रमाण है।
  • अराजकता और नशाखोरी: परीक्षा खत्म होने के बाद कुछ परीक्षार्थियों का सार्वजनिक रूप से शराब/बीयर का सेवन करना अत्यंत दुखद है। यह अनुशासनहीनता उस बढ़ते मानसिक तनाव का परिणाम भी हो सकती है जो बेरोजगारी और असफलता के डर से पनपती है।
  • ट्रैफिक का दम तोड़ना: यातायात प्रबंधन पूरी तरह विफल रहा। सड़कों पर घंटों तक जाम लगा रहा, जिससे न केवल परीक्षार्थी परेशान हुए, बल्कि आम नागरिकों का जनजीवन भी ठप हो गया।

जवाबदेही किसकी है?

जब हजारों की संख्या में परीक्षार्थी एक स्थान पर आते हैं, तो यह पूर्व-नियोजित और अपेक्षित होता है। ऐसी स्थिति में जिम्मेदारियों को बांटा जाना चाहिए:

  1. प्रशासन: इतने बड़े पैमाने पर आयोजित परीक्षा के लिए ‘ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान’ और परीक्षार्थियों के ठहरने की व्यवस्था करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ‘भीड़ प्रबंधन’ में प्रशासनिक विफलता साफ दिखाई दी।
  2. स्थानीय निकाय: परीक्षा केंद्रों के आसपास अभिभावकों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना नगर प्रशासन का काम है।
  3. स्वयं परीक्षार्थी: नशाखोरी और सार्वजनिक अनुशासनहीनता का कोई औचित्य नहीं है। युवाओं को अपनी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए।

निष्कर्ष

आज की परीक्षा का प्रबंधन तो केवल एक लक्षण है, असल बीमारी बेरोजगारी है। मात्र 583 पदों के लिए लाखों की भीड़ यह चीख-चीख कर कह रही है कि राज्य की युवा शक्ति एक ऐसी सुरंग में फंसी है जिसके अंत में रोशनी बहुत कम और हताशा बहुत ज्यादा है। यदि सरकारें समय रहते युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार के रास्ते नहीं खोलतीं, तो यह बढ़ती भीड़ आने वाले समय में एक बड़ा सामाजिक विस्फोट साबित हो सकती है।

सुधार के लिए केवल परीक्षा केंद्र बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना होगा जो युवाओं को छोटे से छोटे पद के लिए मरने-मारने पर उतारू कर देती है।


आपकी आँखों देखी इन घटनाओं ने इस परीक्षा को लेकर जो सवाल खड़े किए हैं, क्या आपको लगता है कि प्रशासन को भविष्य में ऐसी परीक्षाओं के लिए ‘भर्ती कैलेंडर’ और ‘आधारभूत ढांचा नीति’ पर गंभीरता से विचार करना चाहिए?